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स्वतंत्रता दिवस के मंच से Gen Z और Gen Alpha पर फोकस

– विनोद कुमार 

नई दिल्ली, 15 अगस्त 2026। देश के 80वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संबोधन केवल सरकार की उपलब्धियों और भविष्य की योजनाओं का पारंपरिक लेखा-जोखा नहीं रहा। इस बार भाषण के केंद्र में खास तौर पर देश की युवा आबादी, छात्र, Gen Z और Gen Alpha दिखाई दिए। प्रधानमंत्री के संबोधन में प्रतियोगी परीक्षाओं से लेकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, नई तकनीक, रोजगार, स्टार्टअप, खेल और डिजिटल भारत तक ऐसे कई मुद्दे शामिल रहे, जिनका सीधा संबंध देश की युवा पीढ़ी की आकांक्षाओं और चिंताओं से है।

इससे ठीक एक दिन पहले, 14 अगस्त को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के राष्ट्र के नाम संबोधन में भी युवाओं और छात्रों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता मिली थी। राष्ट्रपति ने छात्रों को भारत के भविष्य का शिल्पकार बताते हुए सार्वजनिक परीक्षाओं की विश्वसनीयता और पारदर्शिता पर जोर दिया। पेपर लीक और परीक्षा में अनुचित साधनों जैसी समस्याओं को समाप्त करने की जरूरत पर उनका जोर ऐसे समय में आया है जब प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर युवाओं के बीच लंबे समय से असंतोष और चिंता देखने को मिली है।

दोनों संवैधानिक पदों से लगातार दो दिनों में आए संदेशों को अगर एक साथ देखा जाए तो यह संकेत साफ दिखाई देता है कि युवा मतदाता, छात्र और आने वाली नई पीढ़ी अब केवल रोजगार का विषय नहीं, बल्कि देश की राजनीति और नीति निर्माण का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन चुके हैं।


परीक्षा व्यवस्था पर भरोसा बहाल करने की चुनौती

देश के लाखों युवा हर साल सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रवेश के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल होते हैं। ऐसे में परीक्षा प्रक्रिया की पारदर्शिता उनके भविष्य से सीधे जुड़ी हुई है।

हाल के वर्षों में पेपर लीक, परीक्षा में कथित अनियमितताओं, परिणामों में देरी और भर्ती प्रक्रियाओं को लेकर उठे सवालों ने युवाओं के बीच असंतोष को बढ़ाया है। कई स्थानों पर छात्र संगठनों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं ने परीक्षा प्रणाली में सुधार की मांग को लेकर आंदोलन भी किए हैं।

राष्ट्रपति मुर्मू का सार्वजनिक परीक्षाओं को युवाओं के लिए अवसरों का द्वार बताना इसी व्यापक चिंता की ओर संकेत करता है। संदेश यह है कि परीक्षा केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि करोड़ों युवाओं के भविष्य और सामाजिक गतिशीलता का माध्यम है। अगर परीक्षा व्यवस्था पर भरोसा कमजोर होता है तो उसका असर केवल एक परीक्षा या भर्ती तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर पड़ता है।

प्रधानमंत्री के स्वतंत्रता दिवस संबोधन में प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए देशव्यापी मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग नेटवर्क की बात इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाती है। इसका उद्देश्य उन छात्रों तक गुणवत्तापूर्ण तैयारी की सुविधा पहुंचाना बताया गया है जो महंगी निजी कोचिंग का खर्च वहन नहीं कर सकते।

मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग से कोचिंग इंडस्ट्री की चुनौती?

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए देश में एक बड़ा निजी कोचिंग बाजार पहले से मौजूद है। महानगरों और बड़े शिक्षा केंद्रों में रहने वाले छात्रों को जहां अलग-अलग विषयों के विशेषज्ञ शिक्षकों और टेस्ट सीरीज जैसी सुविधाएं आसानी से मिल जाती हैं, वहीं छोटे शहरों, कस्बों और ग्रामीण इलाकों के छात्रों के लिए ऐसी सुविधाओं तक पहुंच आसान नहीं होती।

सरकार की ओर से प्रस्तावित मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग नेटवर्क इस अंतर को कम करने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है।

डिजिटल प्लेटफॉर्म, बेहतर शिक्षकों और ऑनलाइन अध्ययन सामग्री को एक साथ उपलब्ध कराने की स्थिति में छात्र अपने घर से ही तैयारी कर सकेंगे। इससे आर्थिक रूप से कमजोर और मध्यम वर्गीय परिवारों पर कोचिंग का खर्च कम करने में मदद मिल सकती है।

हालांकि इस योजना की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसकी पहुंच कितनी व्यापक होती है, कंटेंट की गुणवत्ता कैसी रहती है और देश के ग्रामीण एवं कमजोर इंटरनेट वाले इलाकों के छात्रों तक इसकी सुविधा किस तरह पहुंचाई जाती है।

यानी घोषणा महत्वपूर्ण है, लेकिन घोषणा से ज्यादा अहम उसका क्रियान्वयन होगा।

एक साल में एक करोड़ युवाओं को AI ट्रेनिंग का लक्ष्य

प्रधानमंत्री के भाषण का दूसरा बड़ा फोकस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI पर रहा। अगले एक साल में एक करोड़ युवाओं को AI स्किल ट्रेनिंग देने का ऐलान ऐसे समय में हुआ है जब दुनिया भर में रोजगार के स्वरूप में तेजी से बदलाव हो रहा है।

AI अब केवल तकनीकी कंपनियों तक सीमित नहीं है। शिक्षा, बैंकिंग, स्वास्थ्य, मीडिया, कृषि, विनिर्माण, डिजाइन, ग्राहक सेवा और प्रशासन जैसे कई क्षेत्रों में इसका इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है।

ऐसे में सरकार की कोशिश युवाओं को केवल पारंपरिक डिग्री और नौकरियों के लिए तैयार करने के बजाय नई तकनीकी अर्थव्यवस्था के लिए तैयार करने की दिखाई देती है।

लेकिन यहां भी एक बड़ा सवाल है—क्या केवल AI का प्रशिक्षण युवाओं को रोजगार दिलाने के लिए पर्याप्त होगा?

इसके लिए प्रशिक्षण की गुणवत्ता, उद्योग की वास्तविक जरूरतों से उसका जुड़ाव और ट्रेनिंग के बाद रोजगार या उद्यमिता के अवसर पैदा करना भी जरूरी होगा। अगर प्रशिक्षण केवल प्रमाणपत्र देने तक सीमित रहा तो उसका प्रभाव सीमित रह सकता है। लेकिन यदि AI स्किल को वास्तविक उद्योग, स्टार्टअप और रोजगार बाजार से जोड़ा गया तो इसका असर काफी व्यापक हो सकता है।

पारंपरिक सरकारी नौकरी से आगे बढ़ने का संदेश

प्रधानमंत्री ने युवाओं को रोजगार के नए क्षेत्रों की ओर बढ़ने का संदेश भी दिया। इनमें स्टार्टअप, ड्रोन टेक्नोलॉजी, सेमीकंडक्टर, एविएशन, इलेक्ट्रिक व्हीकल, साइबर सिक्योरिटी और बायो-इकोनॉमी जैसे क्षेत्र शामिल हैं।

भारत में लंबे समय से सरकारी नौकरी को सुरक्षित करियर विकल्प के रूप में देखा जाता रहा है। प्रतियोगी परीक्षाओं में लाखों युवाओं की भागीदारी इसी मानसिकता को दर्शाती है।

लेकिन बदलती अर्थव्यवस्था में सरकार का संदेश यह है कि रोजगार की संभावनाएं केवल सरकारी विभागों तक सीमित नहीं हैं। नई तकनीकों और उभरते उद्योगों में भी बड़ी संख्या में अवसर पैदा हो सकते हैं।

यह बदलाव आसान नहीं होगा। इसके लिए शिक्षा व्यवस्था को उद्योग की जरूरतों के अनुरूप बदलना, कौशल प्रशिक्षण को मजबूत करना और युवाओं के लिए स्टार्टअप तथा छोटे कारोबार शुरू करने की प्रक्रिया को आसान बनाना जरूरी होगा।

खेलों में पांच से 15 साल के बच्चों पर नजर

युवाओं पर फोकस का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा खेलों से जुड़ा रहा। 2036 ओलंपिक की मेजबानी की भारत की दावेदारी को मजबूत करने के उद्देश्य से 5 से 15 वर्ष की उम्र के बच्चों के लिए राष्ट्रव्यापी खेल प्रतिभा खोज कार्यक्रम की घोषणा की गई।

इसका महत्व इसलिए भी है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी तैयार करने की प्रक्रिया बहुत कम उम्र से शुरू होती है।

यदि देश के छोटे शहरों, गांवों और दूरदराज के इलाकों से प्रतिभाओं की पहचान की जाती है और उन्हें वैज्ञानिक प्रशिक्षण, पोषण, खेल सुविधाएं और विशेषज्ञ कोच उपलब्ध कराए जाते हैं तो भारत के खेल ढांचे में दीर्घकालिक बदलाव संभव है।

हालांकि प्रतिभा खोज केवल पहला कदम है। असली चुनौती प्रतिभाओं को वर्षों तक प्रशिक्षण और संसाधन उपलब्ध कराने की होगी।

डिजिटल जनगणना और युवाओं की भागीदारी

प्रधानमंत्री ने डिजिटल जनगणना में युवाओं की भागीदारी की जरूरत पर भी जोर दिया। यह भी संकेत है कि सरकार युवाओं को केवल योजनाओं के लाभार्थी के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार के रूप में देखना चाहती है।

डिजिटल तकनीक से जुड़ी पीढ़ी के लिए डेटा, डिजिटल प्लेटफॉर्म और तकनीकी सेवाएं रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हैं। इसलिए आने वाले समय में शासन और नागरिकों के बीच संबंध भी अधिक डिजिटल होने की संभावना है।

युवा आबादी की इस डिजिटल क्षमता का इस्तेमाल यदि शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशासन, रोजगार और नागरिक सेवाओं को बेहतर बनाने में किया जाए तो इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।

वैचारिक संदेश भी भाषण का हिस्सा

प्रधानमंत्री के संबोधन में युवाओं को वैचारिक और सामाजिक स्तर पर भी संदेश दिया गया। उन्होंने 'हथियारी नक्सल' और 'दिमागी नक्सल' के बीच अंतर समझने तथा नकारात्मक विचारधाराओं से दूर रहने की बात कही।

इस हिस्से को केवल रोजगार और शिक्षा की घोषणाओं से अलग राजनीतिक-सामाजिक संदेश के तौर पर भी देखा जा सकता है। सरकार लंबे समय से युवाओं को राष्ट्र निर्माण की मुख्यधारा से जोड़ने और हिंसक या चरमपंथी विचारधाराओं से दूर रखने की बात करती रही है।

हालांकि ऐसे संदेशों को लेकर राजनीतिक बहस भी स्वाभाविक है। विपक्ष और अन्य राजनीतिक दल इस बात पर जोर दे सकते हैं कि युवाओं की वास्तविक समस्याओं—रोजगार, महंगाई, परीक्षा व्यवस्था, शिक्षा की लागत और अवसरों की कमी—का समाधान केवल वैचारिक अपील से नहीं बल्कि ठोस नीतियों से होगा।

दो दिन, दो संबोधन और एक बड़ा संकेत

14 अगस्त को राष्ट्रपति मुर्मू और 15 अगस्त को प्रधानमंत्री मोदी के संबोधनों को साथ रखकर देखने पर एक व्यापक तस्वीर सामने आती है।

राष्ट्रपति का जोर जहां परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, छात्रों के भविष्य और सार्वजनिक परीक्षाओं में भरोसा बहाल करने पर रहा, वहीं प्रधानमंत्री ने मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग, AI स्किलिंग, नए रोजगार क्षेत्र, खेल प्रतिभा और डिजिटल भागीदारी जैसे मुद्दों को सामने रखा।

यानी एक ओर युवा की मौजूदा चिंता है—परीक्षा और रोजगार का भरोसा, और दूसरी ओर भविष्य की अर्थव्यवस्था में युवा की भूमिका—AI, नई तकनीक, स्टार्टअप और नए उद्योग।

यही दोनों भाषणों का साझा संदेश बनता दिखाई देता है।

क्या Gen Z और Gen Alpha अब राजनीति के केंद्र में हैं?

सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यही है।

Gen Z की एक बड़ी आबादी अब मतदान की उम्र में पहुंच चुकी है या पहुंच रही है, जबकि Gen Alpha आने वाले वर्षों में देश के सबसे बड़े युवा समूहों में शामिल होगी। इन पीढ़ियों का सूचना प्राप्त करने का तरीका भी पिछली पीढ़ियों से अलग है।

वे टेलीविजन या अखबार तक सीमित नहीं हैं। सोशल मीडिया, YouTube, Instagram, डिजिटल प्लेटफॉर्म, शॉर्ट वीडियो, पॉडकास्ट और ऑनलाइन कम्युनिटी उनके राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं।

इसलिए राजनीतिक दलों के सामने चुनौती भी बदल रही है। केवल पारंपरिक चुनावी भाषण और घोषणापत्र पर्याप्त नहीं होंगे। युवाओं के बीच यह सवाल ज्यादा महत्वपूर्ण होता जा रहा है कि नौकरी कहां है, परीक्षा कब होगी, पेपर लीक क्यों होता है, शिक्षा कितनी महंगी है, डिजिटल अर्थव्यवस्था में अवसर किसे मिलेंगे और भविष्य की नौकरियों के लिए उन्हें कौन तैयार करेगा।

यही वजह है कि शिक्षा, रोजगार और कौशल विकास अब केवल आर्थिक नीतियां नहीं रह गई हैं। वे राजनीतिक मुद्दे भी बन चुके हैं।

छात्र आंदोलनों ने बढ़ाया दबाव?

हाल के छात्र आंदोलनों की पृष्ठभूमि में इन घोषणाओं को देखना भी महत्वपूर्ण है। जब बड़ी संख्या में युवा परीक्षा व्यवस्था, भर्ती प्रक्रिया या शिक्षा से जुड़े सवालों पर सड़कों पर उतरते हैं तो राजनीतिक दलों के लिए इसे नजरअंदाज करना मुश्किल होता है।

छात्र आंदोलन किसी भी सरकार के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत होते हैं क्योंकि इनमें अक्सर केवल वर्तमान छात्रों की चिंता नहीं होती। इनके पीछे प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा युवा, बेरोजगार स्नातक, नौकरी की तलाश में लगा मध्यम वर्गीय परिवार और बेहतर भविष्य की उम्मीद रखने वाली अगली पीढ़ी भी जुड़ी होती है।

इसलिए परीक्षा सुधार, कोचिंग की लागत कम करना और रोजगार के नए अवसर पैदा करना सरकार के लिए प्रशासनिक जरूरत के साथ-साथ राजनीतिक प्राथमिकता भी बन सकता है।

विपक्ष के लिए भी बड़ा अवसर

इस बदलते राजनीतिक परिदृश्य का असर विपक्षी दलों की रणनीति पर भी पड़ना तय माना जा सकता है। यदि सत्तारूढ़ दल युवाओं को AI, डिजिटल स्किल, मुफ्त कोचिंग और नए रोजगार क्षेत्रों के जरिए जोड़ने की कोशिश करता है तो विपक्ष के सामने भी युवा-केंद्रित वैकल्पिक एजेंडा पेश करने की चुनौती होगी।

विपक्षी दल पहले से ही बेरोजगारी, परीक्षा में कथित अनियमितताओं, पेपर लीक और शिक्षा से जुड़े मुद्दों को उठाते रहे हैं। आने वाले समय में संभव है कि ये मुद्दे और अधिक संगठित युवा एजेंडे के रूप में सामने आएं।

राजनीतिक मुकाबला केवल यह साबित करने तक सीमित नहीं रहेगा कि कौन युवाओं की समस्याओं को ज्यादा जोर से उठाता है। असली मुकाबला इस बात पर होगा कि कौन युवाओं को विश्वसनीय और लागू किए जा सकने वाले समाधान दे सकता है।

Gen Z को केवल 'लुभाना' आसान नहीं होगा

हालांकि यह मान लेना भी जल्दबाजी होगी कि कुछ घोषणाओं से युवा मतदाता किसी एक राजनीतिक दल के साथ स्थायी रूप से जुड़ जाएगा।

Gen Z और आने वाली Gen Alpha की राजनीतिक पसंद को एकरूप मानना भी मुश्किल है। यह पीढ़ी अलग-अलग सामाजिक, आर्थिक और भौगोलिक परिस्थितियों में पली-बढ़ी है। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने इन्हें सरकार के दावों के साथ-साथ विपक्ष और स्वतंत्र स्रोतों के दावों तक भी पहुंच दी है।

इसलिए युवा मतदाता केवल घोषणा नहीं, बल्कि उसके परिणाम भी देखना चाहेगा।

मसलन, मुफ्त कोचिंग वास्तव में कितने छात्रों तक पहुंची? परीक्षा प्रणाली कितनी पारदर्शी हुई? पेपर लीक की घटनाओं पर कितना नियंत्रण हुआ? AI ट्रेनिंग पाने वाले युवाओं में कितनों को वास्तविक रोजगार मिला? खेल प्रतिभाओं में से कितनों को आगे बढ़ने का अवसर मिला?

इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि आज की घोषणाएं आने वाले वर्षों में कितनी प्रभावी साबित होती हैं।

आने वाले चुनावों में बदल सकता है एजेंडा

भारत की राजनीति में युवा हमेशा महत्वपूर्ण रहे हैं, लेकिन डिजिटल युग में उनकी भूमिका और भी बड़ी हो गई है। सोशल मीडिया पर किसी मुद्दे का तेजी से फैलना, छात्र आंदोलनों का राष्ट्रीय विमर्श बन जाना और युवाओं का सरकार से सीधे सवाल करना राजनीतिक दलों की रणनीति को प्रभावित कर रहा है।

ऐसे में आने वाले चुनावों में रोजगार, परीक्षा सुधार, शिक्षा की गुणवत्ता, AI और तकनीकी कौशल, स्टार्टअप, खेल और डिजिटल अवसर जैसे मुद्दे अधिक प्रमुख हो सकते हैं।

राजनीतिक दलों के लिए यह सिर्फ युवाओं को आकर्षित करने का मामला नहीं रहेगा। उन्हें यह भी बताना होगा कि वे अगले दशक की अर्थव्यवस्था में युवाओं के लिए कितने अवसर पैदा कर सकते हैं।

स्वतंत्रता दिवस से निकला सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश

80वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले से प्रधानमंत्री मोदी का संदेश और उससे एक दिन पहले राष्ट्रपति मुर्मू का संबोधन मिलकर एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और सामाजिक संकेत देते हैं।

भारत अब ऐसी पीढ़ी के दौर में प्रवेश कर रहा है जो डिजिटल तकनीक के साथ बड़ी हुई है, पारंपरिक रोजगार की परिभाषाओं पर सवाल करती है और शिक्षा तथा रोजगार में पारदर्शिता को लेकर पहले से अधिक मुखर है।

सरकार के सामने चुनौती है कि युवा ऊर्जा को केवल भाषणों और घोषणाओं तक सीमित न रहने दिया जाए, बल्कि उसे शिक्षा, रोजगार, कौशल, उद्यमिता, खेल और तकनीक के वास्तविक अवसरों में बदला जाए।

और राजनीतिक दलों के सामने चुनौती इससे भी बड़ी है—Gen Z और Gen Alpha को केवल चुनावी वोट बैंक के रूप में नहीं, बल्कि भारत के अगले 25 वर्षों के निर्माण में भागीदार के रूप में देखना।

स्वतंत्रता दिवस के दोनों संबोधनों से कम से कम इतना संकेत जरूर मिल गया है कि आने वाले वर्षों में भारतीय राजनीति में युवाओं का महत्व और बढ़ने वाला है। परीक्षा व्यवस्था से लेकर AI तक और नौकरी से लेकर खेल तक—युवा अब नीतियों के केंद्र में है।

अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कौन युवाओं को लुभाएगा।

बड़ा सवाल यह है कि कौन युवाओं का भरोसा जीत पाएगा—और कौन अपनी घोषणाओं को जमीन पर उतार पाएगा?

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