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आखिर क्यों छीन लिया गया था सुमन कल्याणपुर से कालजयी गीत



– विनोद कुमार‚ वरिष्ठ पत्रकार और लेखक

जब हिंदी फिल्म संगीत पर लता मंगेशकर का लगभग एकछत्र राज था, तब भी सुमन कल्याणपुर ने अपनी गायन प्रतिभा के दम पर अपनी अलग पहचान बनाई।

उनकी आवाज़ में ऐसी मिठास और कोमलता थी कि कई बार श्रोता उन्हें लता मंगेशकर समझ बैठते थे।

उन्होंने मोहम्मद रफी, मुकेश, मन्ना डे, तलत महमूद और किशोर कुमार जैसे दिग्गज गायकों के साथ सैकड़ों गीत गाए।

लेकिन उनकी जिंदगी से जुड़ा एक ऐसा प्रसंग है, जो आज भी संगीत प्रेमियों को हैरान कर देता है।

क्या आप जानते हैं कि एक कालजयी देशभक्ति गीत को गाने के लिए सबसे पहले जिस गायिका को चुना गया था, वह कोई और नहीं, बल्कि सुमन कल्याणपुर थीं?

लेकिन फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि आखिरी वक्त पर उनसे यह गीत छीन लिया गया?

क्यों उस गायिका का सपना टूट गया, जो देश के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के सामने यह गीत गाने की तैयारी कर चुकी थीं?

और क्यों यह टीस उन्हें जीवन भर सालती रही?

आज हम बात करेंगे उस असाधारण गायिका की, जिसने अपनी मधुरता, शालीनता और सुरों की मिठास से करोड़ों दिल जीते, लेकिन जिसे वह पहचान कभी नहीं मिली, जिसकी वह हकदार थीं।

यह प्रसंग जुड़ा है भारत के सबसे लोकप्रिय देशभक्ति गीतों में से एक "ऐ मेरे वतन के लोगों" से।

1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद कवि प्रदीप ने यह गीत लिखा था। संगीतकार सी. रामचंद्र ने इसे स्वरबद्ध किया था। यह गीत 27 जनवरी 1963 को दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में आयोजित एक कार्यक्रम में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के समक्ष प्रस्तुत किया जाना था।

आज दुनिया जानती है कि इस गीत को लता मंगेशकर ने गाया था और उनके गायन ने नेहरू जी की आंखों में आंसू ला दिए थे।

लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि सुमन कल्याणपुर ने एक इंटरव्यू में दावा किया था कि शुरुआत में यह गीत उन्हें ऑफर किया गया था।

उन्होंने बताया था कि उन्हें इस गीत की रिहर्सल के लिए बुलाया गया था और वह इसे गाने की तैयारी भी कर चुकी थीं। देश के प्रधानमंत्री के सामने प्रस्तुति देने का अवसर किसी भी कलाकार के लिए जीवन का सबसे बड़ा सम्मान हो सकता था और सुमन भी बेहद उत्साहित थीं।

लेकिन फिर अचानक परिस्थितियां बदल गईं।

जब वह कार्यक्रम में पहुंचीं, तो उन्हें बताया गया कि वह "ऐ मेरे वतन के लोगों" नहीं गाएंगी, बल्कि कोई दूसरा गीत प्रस्तुत करेंगी।

यह सुनकर सुमन कल्याणपुर स्तब्ध रह गईं।

जिस गीत के लिए उन्होंने दिन-रात मेहनत की थी, जिसकी हर पंक्ति को उन्होंने अपने सुरों में ढाला था, वह गीत अचानक उनसे ले लिया गया था।

सुमन कल्याणपुर ने बाद के वर्षों में कई बार कहा कि वह आज तक यह नहीं समझ पाईं कि आखिर उनसे यह गीत क्यों वापस ले लिया गया और किसी दूसरे को क्यों दे दिया गया।

उनके अनुसार, यह घटना उनके जीवन की सबसे बड़ी निराशाओं में से एक थी।

हालांकि इतिहास ने जो फैसला किया, वह सबके सामने है। "ऐ मेरे वतन के लोगों" लता मंगेशकर की आवाज़ में अमर हो गया और भारतीय संगीत इतिहास का हिस्सा बन गया।

लेकिन इस कहानी का दूसरा पहलू यह भी है कि उस गीत के पीछे एक ऐसी गायिका का अधूरा सपना भी छिपा है, जिसका नाम था सुमन कल्याणपुर।

दोस्तों, सुमन कल्याणपुर के पास सुर थे, साधना थी, मधुरता थी और श्रोताओं का प्यार भी था, लेकिन शायद किस्मत ने उनके हिस्से में वह चमक नहीं लिखी थी, जिसकी उनकी प्रतिभा हकदार थी।

फिर भी भारतीय संगीत का इतिहास उनके बिना कभी पूरा नहीं हो सकता।

और शायद यही वजह है कि आज भी जब उनके गीत कानों में पड़ते हैं, तो एहसास होता है कि यह आवाज़ सिर्फ एक गायिका की नहीं थी, बल्कि उस दौर की सबसे अनमोल और सबसे कम आंकी गई संगीत प्रतिभाओं में से एक की थी।


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