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झारखंड में इंक़लाब के कृतिस्तंभ हैं कॉमरेड महेंद्र सिंह





16 जनवरी 2005—यह तारीख झारखंड के इतिहास में केवल एक राजनीतिक हत्या की नहीं, बल्कि एक ऐसे जननायक की शहादत की है, जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी अन्याय के विरुद्ध संघर्ष में समर्पित कर दी। गिरिडीह ज़िले के सरिया प्रखंड अंतर्गत दुर्गी–धवैया गांव में, जब हथियारबंद हत्यारों ने उनसे पूछा—“महेंद्र सिंह कौन है?” और उन्होंने निर्भीक स्वर में उत्तर दिया—“हाँ, मैं ही महेंद्र सिंह हूँ,”—तो वह क्षण केवल पहचान का नहीं, बल्कि एक संघर्षशील विचारधारा की सार्वजनिक घोषणा बन गया।

गोलियाँ शरीर को छलनी कर सकती हैं, विचारों को नहीं।



जनता के पक्ष में खड़ी निर्भीक राजनीति



कॉमरेड महेंद्र सिंह झारखंड के उन विरले नेताओं में थे, जिन्होंने राजनीति को सत्ता-सुख का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का औज़ार बनाया। गरीबों, किसानों, मज़दूरों, दलितों, आदिवासियों और हाशिए पर खड़े समाज की आवाज़ बनकर उन्होंने यह सिद्ध किया कि सच्ची राजनीति जनता से पैदा होती है और जनता के लिए होती है।
1978 के बाद सक्रिय राजनीति में उतरते ही उन्होंने स्पष्ट कर दिया था—यह समझौतों की नहीं, संघर्ष की राजनीति होगी।




ज़मींदारी के ख़िलाफ़ संघर्ष और ग्राम-स्वराज



खंभरा गांव से शुरू हुआ उनका आंदोलन ज़मींदारी प्रथा की जड़ों पर सीधा प्रहार था। उन्होंने संगठित जनशक्ति के बल पर शोषणकारी ढाँचों को चुनौती दी और ग्राम सभा को न्याय का केंद्र बनाया। थानों और अदालतों के बजाय गांवों में सामूहिक निर्णय—यह कोई प्रशासनिक प्रयोग नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चेतना का जीवंत अभ्यास था। आज भी ऐसे कई लोग हैं, जिनके जीवन की दिशा ग्राम सभा के उस अनुभव से बदली।



जेल में भी संघर्ष : कैदियों के अधिकार



झूठे मुकदमों में जेल भेजे जाने के बावजूद महेंद्र सिंह का संघर्ष रुका नहीं। जेल की दीवारों के भीतर भी उन्होंने कैदियों के मानवीय अधिकारों—सम्मानजनक व्यवहार, स्वच्छ भोजन और न्याय—के लिए आवाज़ उठाई।
उनकी राजनीति की यही पहचान थी—जहाँ अन्याय, वहीं प्रतिरोध।



बगोदर से तीन बार विधायक : जनता का ऐतिहासिक भरोसा



बगोदर विधानसभा क्षेत्र से तीन बार विधायक चुना जाना केवल चुनावी सफलता नहीं, बल्कि जनता के गहरे भरोसे का प्रमाण था। उन्होंने साबित किया कि जागरूक जनता व्यवस्था को जवाबदेह बना सकती है। पंचायतों में भ्रष्टाचार पर अंकुश और जनता की सीधी भागीदारी—यह उनके राजनीतिक प्रयोग की उल्लेखनीय उपलब्धियाँ रहीं।




पंचायती राज : सत्ता का विकेंद्रीकरण



विधानसभा में महेंद्र सिंह ने पंचायती राज को काग़ज़ी ढांचा नहीं, बल्कि जन-परिवर्तन का हथियार माना। गरीब, किसान, महिलाएँ और शोषित वर्ग—सभी को सत्ता में हिस्सेदार बनाने की उनकी सोच ने लोकतंत्र को नीचे तक पहुँचाने की दिशा में ठोस आधार दिया।




गोलीकांडों के ख़िलाफ़ अडिग प्रतिरोध



तपकारा (2001), तुपकाडीह (1999), लेवाटांड (2001)—जहाँ-जहाँ राज्य की गोलियाँ जनता पर चलीं, वहाँ-वहाँ कॉमरेड महेंद्र सिंह सबसे आगे खड़े दिखाई दिए।लेवाटांड गोलीकांड के बाद उनका आमरण अनशन इस बात का प्रमाण था कि वे सदन और सड़क—दोनों को संघर्ष का मैदान मानते थे। उनका संदेश साफ़ था—यह किसी दल का नहीं, जनता की अस्मिता का सवाल है।



शहादत : विचारों की अमरता



16 जनवरी 2005 को, नामांकन के अगले ही दिन, जब वे एक सभा को संबोधित करने के बाद आम लोगों की समस्याएँ—इंदिरा आवास, वृद्धा पेंशन—सुन रहे थे, तभी उन्हें गोलियों से भून दिया गया।
आज भी सवाल गूंजता है—एक जननायक से इतनी नफ़रत क्यों?
क्योंकि वे डरते नहीं थे,
क्योंकि वे बिकते नहीं थे,
क्योंकि वे शोषण के हर ढांचे के लिए ख़तरा थे।



आज भी जीवित हैं कॉमरेड महेंद्र सिंह


इक्कीस वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन उनकी अनुपस्थिति हर उस मोड़ पर महसूस होती है—जहाँ अन्याय खड़ा हो, जहाँ सत्ता जनता पर गोली चलाए, जहाँ गरीबों की आवाज़ दबाई जाए।

वे आज हमारे बीच शारीरिक रूप से नहीं हैं, लेकिन हर संघर्ष, हर प्रतिरोध और हर इंक़लाबी आवाज़ में जीवित हैं।


शहादत दिवस पर संकल्प


कॉमरेड महेंद्र सिंह को सच्ची श्रद्धांजलि यही है कि हम उनके सपनों के झारखंड के लिए संघर्ष करें—
जहाँ सत्ता जनता की हो,
जहाँ न्याय डर से नहीं, हक़ से मिले,
और जहाँ हर शोषित इंसान सिर उठाकर जी सके।


(लेख—काशीनाथ केवट)

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