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क्या औपनिवेशिक बंगाल में टॉनिक मर्दानगी हासिल की जाती थी

पुरानी कमजोरी के इलाज के तौर पर चिकित्सक कई तरह की टाॅनिकों एवं गोलियों का सेवन करने का सुझाव देते रहे हैं। आयुर्वेद में एफ़्रोडाइजियस के रूप में कार्य करने वाली ढेर सारी दवाइयां उपलब्ध है।  ये सभी दवाइयां खोई हुई जवानी और यौन क्षमता बढ़ाने के नाम पर बाजार में बिक रही है। इन टाॅनिकों का विज्ञापन करने वालेों के लिए काफी संभावनाएं मिल जाती है क्योंकि इस क्षेत्र में काफी रिक्तता है जिसे भरा जाना बाकी है। विज्ञापन दाता आदमी के यौन स्वास्थ्य के बारे में परम्परागत विचारों को आगे बढातें है और इस तरह से उन्हें उम्मीद होती है कि विज्ञापन पढ़ने वाले उन टाॅनिकों, औशघियों और लोषनों को खरीदेंगे। विज्ञापनदाता पुरूषों की यौन क्षमता की दुनिया में प्रचलित चिंताओं को प्रचारित करते हैं और बताते हैं कि राजनीतिक एवं सामाजिक क्षेत्र में जो कमियों हैं उनका संबंध यौन कमियों से है। 


बंगाल मे मर्दानगी अलग-अलग स्तरों पर विकसित हुई। शोधकर्ता मृणालिनी सिन्हा का तर्क है कि बंगालियों को लेकर औपनिवेशिक ठेठ धारणा उनकी पश्चात्य षिक्षा से उत्पनन मूल्य संबंधी विकास और मार्शल रेसियोलाॅजी के बीच झूलतीरही। बंगाली, आला दर्जे के बुद्धिजीवी लेकिन साथ ही साथ दास मानसिकता के माने जाते रहे जिनका जीवन सोचने-समझने वाला रहा लेकिन साथ ही साथ बहुत ही अषक्त रहे। वे ऐसे नस्ल के सदस्य रहे जो शायद कभी बहादुर था।


भौतिक सांस्कृतिक आन्दोलन में मर्दानगी पर जोर गोरे शासक वर्ग के नस्लवाद का जवाब था। बंगाल में राष्ट्रवाद मर्दानगी की धारणा में घुलमिल गई थी। पश्चिम बंगाल के आसनसोल के काजी नजरूल यूनिवर्सिटी के अमिताभ चटर्जी के अनुसार प्रारंभिक राष्ट्रवाद के पाठ्यक्रम के एक आवश्यक हिस्से के रूप में भौतिक संस्कृति के विचार को औपनिवेशिक बंगाल में तुरंत स्वीकृति मिली। मीडिया ने ताकत, तेज और पुरूशत्व बढ़ाने के उपाय के रूप में एंड्रोजेनिक एनाबॉलिक स्टेरॉयड की महिमा की। 


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