– विनोद कुमार‚ वरिष्ठ पत्रकार
कारपूलिंग, बसों का उपयोग और घर व ऑफिस से काम करने (हाइब्रिड वर्क) जैसे उपाय जी20 देशों के सालाना परिवहन उत्सर्जन को 20 प्रतिशत तक घटा सकते हैं; 2050 तक सालाना तेल खर्च में लगभग 90 बिलियन अमेरिकी डॉलर बचा सकते हैं: सीईईडब्ल्यू
- सिर्फ कारपूलिंग 2050 में जी20 देशों का यात्री परिवहन उत्सर्जन सालाना 20 प्रतिशत तक घटा सकती है
- इस बचत का 80-88 प्रतिशत हिस्सा विकसित देशों और चीन के खाते में आएगा
- 2050 तक मिशन लाइफ जैसे व्यवहार परिवर्तन से संपूर्ण रूप से 2024 की वैश्विक तेल मांग के 59 प्रतिशत के बराबर बचत हो सकती है
नई दिल्ली, 03 सितंबर 2026: जैसे-जैसे सरकारें इलेक्ट्रिक वाहनों की दिशा में बदलाव को तेज कर रही हैं, अगर जी20 (G20) देशों के यात्री कारपूलिंग, बसों का …
अभूतपूर्व अल नीनो के मजबूत होने के बीच भारत, बांग्लादेश, नेपाल और भूटान गर्मी और स्वास्थ्य के मुद्दे पर एक साथ आए: GHHIN साउथ एशिया हब
● ग्लोबल हीट हेल्थ इंफॉर्मेशन नेटवर्क साउथ एशिया हब (GHHIN साउथ एशिया हब) ने भारत, नेपाल, बांग्लादेश और भूटान के लिए गर्मी और स्वास्थ्य पर पहले राष्ट्र-स्तरीय आकलन जारी किए
● कभी मैदानी इलाकों में केंद्रित रही गर्मी अब ऊपर चढ़कर हिमालयी देशों नेपाल और भूटान तक पहुंच रही है
● चारों देशों ने हीट एक्शन प्लान और पूर्व चेतावनी प्रणालियां बनाई हैं, अब अगला कदम इन्हें जमीनी सुरक्षा में बदलना है
पूरे प्रशांत महासागर में एक अभूतपूर्व अल नीनो (El Niño) मजबूत हो रहा है, जिससे पूरे दक्षिण एशिया के सामने गर्मी का एक और गंभीर मौसम आने का खतरा बढ़ गया है। ऐसे में भारत, नेपाल, बांग्लादेश और भूटान इसके असर का एकजुट होकर सामना करने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। आज ग्लोबल हीट फोरम में चार नए कंट्री ब्रीफ (country briefs) जारी किए गए, जिनसे पता चलता है कि ये देश कैसे भीषण गर्मी का सामना कर रहे हैं और उसके लिए क्या तैयारी कर रहे हैं, और अभी कहां पर कमियां बाकी हैं। यहां पर आज जारी ये आकलन ग्लोबल हीट हेल्थ इंफॉर्मेशन नेटवर्क (Global Heat Health Information Network, GHHIN) - साउथ एशिया हब के पहले आकलन हैं, जिसकी मेजबानी नई दिल्ली स्थित 'काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर' (सीईईडब्ल्यू) कर रहा है। इसके साझेदार संगठनों में सस्टेनेबल फ्यूचर्स कोलैबोरेटिव (एसएफसी), नेचुरल रिसोर्सेज डिफेंस काउंसिल (एनआरडीसी), ब्रैक जेम्स पी. ग्रांट स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ (बीआरएसी जेपीजीएसपीएच) और यूनाइटेड नेशंस इकोनॉमिक एंड सोशल कमीशन फॉर एशिया एंड द पैसिफिक (यूएनईएससीएपी) शामिल हैं और इसे डब्ल्यूएचओ-डब्ल्यूएमओ क्लाइमेट एंड हेल्थ जॉइंट प्रोग्राम (WHO-WMO Climate and Health Joint Programme) के समन्वय से संचालित किया जा रहा है।
आकलनों के मुताबिक, चारों देशों में इस दिशा में कार्यों ने वास्तव में रफ्तार पकड़ी है। इस क्षेत्र में हीट एक्शन प्लान और पूर्वानुमान व पूर्व चेतावनी के माध्यम से बचाव की तैयारियां योजना निर्माण और नीतिगत स्तर पर सबसे तेजी से आगे बढ़ रही हैं। लेकिन स्वास्थ्य निगरानी, स्थानीय कार्रवाई के लिए वित्तपोषण (funded local action), और स्वास्थ्य, श्रम व शहरी नियोजन में गर्मी को शामिल करने जैसी व्यवस्थाओं, जो इन्हें जमीनी कार्रवाई और सुरक्षा में बदलती हैं, को अब इनकी बराबरी पर लाने की जरूरत है। हालांकि, कुछ देश इस अंतर को दूर करने के लिए व्यापक स्तर पर शुरुआत कर रहे हैं, लेकिन प्रयासों में असमानता बनी हुई है।
भारत में सीईईडब्ल्यू का जिला-स्तरीय अध्ययन पहले ही बता चुका है कि 57 प्रतिशत जिले अभी से गर्मी के उच्च से बहुत उच्च जोखिम का सामना कर रहे हैं। इन जिलों में देश की लगभग तीन-चौथाई आबादी रहती है। घटना के बाद की राहत प्रतिक्रिया की जगह पर पहले से जोखिम घटाने की दिशा में कदम उठाकर, भारत दक्षिण एशिया क्षेत्र में सबसे आगे बना हुआ है। भारत में 250 से अधिक शहर और जिला स्तरीय हीट एक्शन प्लान लागू हैं और आपदा जोखिम प्रबंधन कोष के तहत लू (heatwave) को अब एक अधिसूचित प्राकृतिक आपदा के रूप में मान्यता दी जा चुकी है। भारत ने गर्मी से होने वाली बीमारियों के लिए राष्ट्रीय निगरानी व्यवस्था भी बनाई है और इनसे निपटने के लिए 18,000 से अधिक मेडिकल ऑफिसरों को प्रशिक्षण दिया है। GHHIN आकलन का सुझाव है कि अगला कदम गर्मी से निपटने की कार्रवाई को आपदा प्रबंधन से आगे ले जाना है, जिसके लिए अलग से फंड होना चाहिए और हर योजना में स्वास्थ्य से जुड़े नतीजों को शामिल किया जाना चाहिए।
नेपाल, ऊंचाई पर बसे इस हिमालयी देश में जहां पहले केवल बाढ़ और सूखे जैसी जल-मौसम संबंधी आपदाओं का खतरा रहता था, वहीं अब यह भीषण गर्मी के जोखिमों का भी सामना कर रहा है। राष्ट्रीय मौसम विभाग के अनुसार, 2024 में दक्षिणी तराई के मैदानों में 50 दिन तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर रहा। इसकी प्रतिक्रिया में नेपाल ने अपनी पहली संघीय हीट योजना (federal heat plan) जारी किया और चरणबद्ध हीट अलर्ट (tiered heat alerts) प्रणाली का संचालन शुरू किया है। लेकिन स्वास्थ्य व्यवस्था अभी भी गर्मी से होने वाली बीमारियों के आंकड़ों को व्यवस्थित ढंग से दर्ज नहीं किया जाता है। GHHIN आकलन का सुझाव है कि स्वास्थ्य निगरानी में गर्मी को भी शामिल किया जाए, जिसकी शुरुआत तराई के अस्पतालों में गर्मी के कारण भर्ती होने वाले मरीजों को अनिवार्य रूप से दर्ज करने से हो। साथ में, जल विज्ञान एवं मौसम विज्ञान विभाग की चेतावनियों को जमीनी कार्रवाई में बदलने की प्रक्रिया को मजबूत बनाया जाए, ताकि वे अंतिम सिरे तक पहुंच सकें।
बांग्लादेश में, विश्व बैंक के अनुसार, 1980 से अब तक महसूस होने वाले तापमान (feels-like temperature), जो तापमान और नमी को मिलाकर तय होता है, में लगभग 4.5 डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि हो चुकी है। अब साल का लगभग एक-तिहाई हिस्सा खतरनाक उमस भरी गर्मी वाला होता है। बांग्लादेश ने अपनी राष्ट्रीय अनुकूलन योजना (national adaptation plan) में गर्मी को मान्यता दी है और नारायणगंज में अपना पहला शहरी हीट एक्शन प्लान बनाया है। इसके अलावा, गर्मी से जुड़ी बीमारियों पर एक राष्ट्रीय दिशानिर्देश जारी करने के साथ-साथ "बी.ई.ए.टी. द हीट" ("B.E.A.T. the Heat") नाम से एक जन अभियान की भी शुरुआत की है। GHHIN आकलन में राष्ट्रीय और उप-राष्ट्रीय स्तर पर अलग से हीट एक्शन प्लान बनाने की जरूरत बताई गई है। साथ में, राष्ट्रीय स्तर के पूर्वानुमानों को उसके अस्पतालों से जोड़ने के लिए एक गर्मी-स्वास्थ्य निगरानी प्रणाली की जरूरत रेखांकित की गई है।
भूटान में, दक्षिणी निचले इलाकों में बढ़ती गर्मी कभी ठंडी रहने वाली घाटियों को अधिक तापमान की दिशा में धकेल रही है। इससे एक ऐसी आबादी के सामने गर्मी का जोखिम पैदा हो रहा है, जिसे पहले कभी भीषण गर्मी से बचाव की कोई योजना बनाने नहीं बनानी पड़ी थी। राष्ट्रीय स्तर के निर्देशों में गर्मी से जुड़ी जिम्मेदारियों को पहले से स्वास्थ्य मंत्रालय को सौंपा गया है। 2022 का एक नियम श्रमिकों को गर्मी से सुरक्षा देने को अनिवार्य बनाता है। भूटान की बाढ़ और ग्लेशियर झीलों के लिए सुविकसित पूर्व चेतावनी प्रणालियां उसे एक मजबूत आधार देती है, जिसे गर्मी के मामले में बढ़ाया जा सकता है। GHHIN आकलन में इन निर्देशों को मिलाकर एक ही हीट एक्शन प्लान बनाने का सुझाव दिया गया है।
डॉ. विश्वास चितले, फेलो, सीईईडब्ल्यू, और अध्यक्ष, GHHIN साउथ एशिया हब, ने कहा, "दक्षिण एशिया में भीषण गर्मी अब पूरे साल बनी रहने वाली एक क्षेत्रीय जोखिम बन चुकी है, और ये आकलन दिखाते हैं कि यह क्षेत्र शून्य से शुरुआत नहीं कर रहा है। भारत में हमारे जिला-स्तरीय काम ने दिखाया है कि गर्मी का जोखिम कितनी तेजी से बढ़ रहा है और इस क्षेत्र के प्रत्येक देश ने यह अनुमान लगाया है कि पांच साल पहले की तुलना में गर्मी की स्थिति खराब हुई है। अब इन पूर्वानुमानों को स्वास्थ्य व्यवस्थाओं, स्थानीय बजट और श्रम नियमों से जोड़ने की जरूरत है, ताकि प्रत्येक चेतावनी को भरोसेमंद ढंग से सुरक्षा में बदला जा सके।"
डॉ. फरजाना मीशा, BRAC JPGSPH, ने कहा, "गर्मी इस क्षेत्र के उन स्वास्थ्य जोखिमों में से है, जिन्हें सबसे कम मान्यता मिली है। यह बाढ़ या चक्रवात की तरह साफ-साफ दिखाई नहीं देती, लेकिन स्वास्थ्य, कामकाज और खाद्य सुरक्षा को उनसे कम नुकसान भी नहीं पहुंचाती है। बांग्लादेश में हमने कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। गर्मी से जुड़ी बीमारियों पर एक राष्ट्रीय दिशानिर्देश आ चुका है और नारायणगंज में पहला शहरी हीट एक्शन प्लान बना है। इसके साथ ढाका, राजशाही और अन्य शहरी केंद्रों में भी ऐसे प्रयास हो रहे हैं। अब यही कदम पूरे दक्षिण एशिया में उठाने की जरूरत है। स्वास्थ्य व्यवस्थाएं ऐसे बनाई जाएं और उन्हें इतना फंड मिले कि वे गर्मी का अनुमान कर सकें और लोगों की सेहत को कोई नुकसान पहुंचने से पहले कदम उठा सकें।"
प्रिमा मदान, डायरेक्टर - कूलिंग एंड क्लाइमेट रेजिलिएंस, एनआरडीसी, ने कहा, "भीषण गर्मी सिर्फ एक तकनीकी चुनौती नहीं है, बल्कि एक गंभीर मानवीय चुनौती है, जो पूरे दक्षिण एशिया में स्वास्थ्य, समानता, उत्पादकता और सततशीलता को प्रभावित करती है। समुदाय लंबे समय से गर्मी से निपटने के पारंपरिक उपायों पर निर्भर रहे हैं, लेकिन लू के बहुत तेज होने और बार-बार आने से ये तरीके अब नाकाफी साबित हो रहे हैं। भारत की शुरुआती कार्रवाई और उसका हीट एक्शन प्लान नेटवर्क, जो दुनिया में ऐसे सबसे बड़े नेटवर्कों में से एक है, दिखाता है कि ऐसी तैयारी से जीवन बचता है। अब कार्यान्वयन, स्वास्थ्य व्यवस्थाओं और स्थानीय वित्त को मजबूत बनाने, और पूरे क्षेत्र में समाधानों को आपस में साझा करने की जरूरत है। GHHIN साउथ एशिया हब ठीक यही काम करने के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण मंच उपलब्ध कराता है।"
डॉ. पूर्वी पटेल, एसएफसी, ने कहा, "भारत ने हीट एक्शन प्लान की बढ़ती संख्या और स्वास्थ्य निगरानी के विस्तार के जरिए गर्मी का सामना करने की कार्रवाई को मजबूत बनाने की एक उम्मीद भरी शुरुआत की है। अगला पड़ाव इन योजनाओं को संस्थागत रूप देना और यह आकलन करना है कि क्या ये कार्रवाइयां उम्मीद के मुताबिक लोगों के स्वास्थ्य सुरक्षा दे रही हैं। स्थायी बदलावों के लिए हमें गर्मी-स्वास्थ्य अनुकूलन (heat-health adaptation) को लागू करने और उसके मूल्यांकन में स्वास्थ्य से जुड़े नतीजों को केंद्र में रखने की जरूरत होगी। साथ में, यह भी समझना होगा कि दीर्घकालिक लचीलेपन (resilience) के लिए अल्पकालिक कदमों के साथ व्यवस्थागत सुधार और उचित वित्तपोषण की भी जरूरत होती है। इसके साथ, लगातार गर्म होती दुनिया में गहराई और निरंतरता से जलवायु शमन (climate mitigation) के प्रयास किए जाने भी जरूरी हैं।"
कियोंग को, डायरेक्टर, आईसीटी एंड डिजास्टर रिस्क रिडक्शन डिवीजन, यूएनईएससीएपी, ने कहा, "गर्मी सीमाओं पर नहीं रुकती है, और न ही इसका सामना करने की कोशिशें सीमाओं पर रुकनी चाहिए। प्रत्येक देश शून्य से शुरुआत करे, इसकी जगह पर देश अपने पूर्वानुमान साझा कर सकते हैं, उन मानकों (thresholds) के साथ अनुरूपता ला सकते हैं, जिनके आधार पर कार्रवाई शुरू की जाती है, और गर्मी को उन आपदा प्रणालियों में शामिल कर सकते हैं, जो पहले से संचालित हो रही हैं। यूएनईएससीएपी की भूमिका इस सहयोग को, साझा पूर्व चेतावनी प्रणाली से लेकर सीमा-पार कूलिंग कॉरिडोर (cross-border cooling corridors) तक, व्यावहारिक बनाना है।"
पूरे दक्षिण एशिया में गर्मी का जोखिम लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में ये आकलन अलग-अलग देशों में बिखरी हुई प्रतिक्रियाओं से हटकर एक साझा क्षेत्रीय साक्ष्यों का आधार (evidence base) बनाने की दिशा में बदलाव के संकेत हैं। ग्लोबल हीट फोरम के आयोजन के बाद यह साउथ एशिया हब संस्थानों और प्रशिक्षण कार्यक्रमों का एक क्षेत्रीय नेटवर्क बनाने की शुरुआत करेगा और इन आकलनों को चारों देशों की सरकारों के लिए गर्मी के मौसम से पहले व बाद की ब्रीफिंग में भी बदलेगा। इसका उद्देश्य गर्मी से जुड़े विज्ञान को इस क्षेत्र के सबसे सुभेद्य समुदायों के लिए समन्वय आधारित कार्रवाई में बदलने की क्षमता तैयार करना है।


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